आज का श्लोक शनिवार, 17 जनवरी 2026
भगवद्गीता, उपनिषद, वेद, सुभाषित और प्रसिद्ध स्तोत्रों से प्रतिदिन एक संस्कृत श्लोक, लिप्यन्तरण और अर्थ सहित। कुल 132 श्लोक क्रम से।
श्रीमद्भगवद्गीता 18.66
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।sarvadharmānparityajya māmekaṃ śaraṇaṃ vraja |
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥ahaṃ tvā sarvapāpebhyo mokṣayiṣyāmi mā śucaḥ ||
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अर्थ
सब धर्मों को छोड़कर केवल मेरी शरण में आ जाओ। मैं तुम्हें सब पापों से मुक्त कर दूँगा; शोक मत करो।
Setting aside all other duties, take refuge in Me alone. I will free you from all wrongs; do not grieve.
अर्थ हमारा अपना संक्षिप्त भावार्थ है, शब्दशः अनुवाद नहीं।
पिछले श्लोक
पिछले दिनों में से हर दिन का श्लोक।
- 16/01/2026 (शुक्र) तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया । श्रीमद्भगवद्गीता 4.34
- 15/01/2026 (गुरु) या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता । देवी माहात्म्य (दुर्गा सप्तशती) 5 (Aparajita Stuti)
- 14/01/2026 (बुध) मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः । अमृतबिन्दु उपनिषद् 2
- 13/01/2026 (मंगल) पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति । श्रीमद्भगवद्गीता 9.26
- 12/01/2026 (सोम) बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते । श्रीमद्भगवद्गीता 2.50
- 11/01/2026 (रवि) काकः कृष्णः पिकः कृष्णः को भेदः पिककाकयोः । पारम्परिक सुभाषित
- 10/01/2026 (शनि) ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । बृहदारण्यकोपनिषद् 5.1.1
- 09/01/2026 (शुक्र) विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि । श्रीमद्भगवद्गीता 5.18
- 08/01/2026 (गुरु) भज गोविन्दं भज गोविन्दं गोविन्दं भज मूढमते । भज गोविन्दम् (आदि शंकराचार्य) 1
- 07/01/2026 (बुध) सं गच्छध्वं सं वदध्वं सं वो मनांसि जानताम् । ऋग्वेद 10.191.2
- 06/01/2026 (मंगल) अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः । श्रीमद्भगवद्गीता 10.20
- 05/01/2026 (सोम) आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत् । श्रीमद्भगवद्गीता 2.70
- 04/01/2026 (रवि) क्षणशः कणशश्चैव विद्यामर्थं च साधयेत् । पारम्परिक सुभाषित
- 03/01/2026 (शनि) श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यमेतस्तौ सम्परीत्य विविनक्ति धीरः । कठोपनिषद् 1.2.2
- 02/01/2026 (शुक्र) यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता । श्रीमद्भगवद्गीता 6.19
- 01/01/2026 (गुरु) अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे । श्रीमद्भगवद्गीता 2.11