श्लोक 29 / 30 · चरण 4: चार पंक्तियों की स्तुतियाँ

अतुलितबलधामं

रामचरितमानस, सुन्दरकाण्ड, आरम्भिक श्लोक 3

पाठ

अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं

दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम् ।

सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं

रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि ॥

atulitabaladhāmaṃ hemaśailābhadehaṃ

danujavanakṛśānuṃ jñānināmagragaṇyam |

sakalaguṇanidhānaṃ vānarāṇāmadhīśaṃ

raghupatipriyabhaktaṃ vātajātaṃ namāmi ||

अर्थ

अतुलनीय बल के धाम, सोने के पर्वत के समान कान्तिमय शरीर वाले, दैत्य-रूपी वन के लिए अग्नि, ज्ञानियों में अग्रगण्य, समस्त गुणों के निधान, वानरों के स्वामी, रघुपति के प्रिय भक्त पवनपुत्र को मैं नमस्कार करता/करती हूँ।

शब्दार्थ

शब्दरोमनअर्थ
अतुलितबलधामंatulitabaladhāmaṃअतुलनीय बल के धाम
हेमशैलाभदेहंhemaśailābhadehaṃस्वर्ण-पर्वत के समान कान्तिमय देह वाले
दनुजवनकृशानुंdanujavanakṛśānuṃदैत्य-रूपी वन के लिए अग्नि
ज्ञानिनामग्रगण्यम्jñānināmagragaṇyamज्ञानियों में अग्रगण्य
सकलगुणनिधानंsakalaguṇanidhānaṃसमस्त गुणों के निधान
वानराणामधीशंvānarāṇāmadhīśaṃवानरों के स्वामी
रघुपतिप्रियभक्तंraghupatipriyabhaktaṃरघुपति के प्रिय भक्त
वातजातंvātajātaṃपवनपुत्र
नमामिnamāmiनमन करता/करती हूँ

उच्चारण-अभ्यास

अaतुtuलिliतtaबbaलlaधाdhāमंmaṃ हेheमmaशैśaiलाlāभbhaदेdeहंhaṃ दdaनुnuजjaवvaनnaकृkṛशाśāनुंnuṃ ज्ञाjñāनिniनाnāमmaग्रgraगgaण्यम्ṇyam । सsaकkaलlaगुguणṇaनिniधाdhāनंnaṃ वाvāनnaराrāणाṇāमmaधीdhīशंśaṃ रraघुghuपpaतिtiप्रिpriयyaभbhaक्तंktaṃ वाvāतtaजाjāतंtaṃ नnaमाmāमिmi ॥

60 अक्षर, 88 मात्राएँ · रेखांकित अक्षर गुरु (दीर्घ या भारी) हैं; इन्हें लघु (ह्रस्व) अक्षरों से लगभग दुगना खींचा जाता है।

यह आवाज़ आपके उपकरण की कृत्रिम वाणी है। यह केवल अनुमानित है और संस्कृत के उच्चारण (स्वर की मात्रा, विसर्ग, संयुक्ताक्षर) में चूक सकती है। गुरु से या प्रामाणिक रिकॉर्डिंग से सीखें।

कण्ठस्थ करें

स्लाइडर खिसकाकर अधिक शब्द छिपाएँ, श्लोक बोलें, फिर छिपे शब्द पर टैप करके जाँचें।

।

॥

कितना याद रहा?

बिना देखे पाठ करें, फिर ईमानदारी से चुनें। कठिन श्लोक जल्दी लौटकर आएँगे।

साइन इन नहीं है: दोहराने की सारणी केवल इसी डिवाइस पर रहेगी।